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Showing posts from October, 2024

दुर्गा चालीसा

॥ चौपाई ॥ नमो नमो दुर्गे सुख करनी।   नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥ निराकार है ज्योति तुम्हारी।   तिहूँ लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला।   नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥   रूप मातु को अधिक सुहावे।   दरश करत जन अति सुख पावे॥ तुम संसार शक्ति लय कीना।   पालन हेतु अन्न धन दीना॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला।   तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥ प्रलयकाल सब नाशन हारी।   तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।   ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥ रूप सरस्वती को तुम धारा।   दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥ धरा रूप नरसिंह को अम्बा।   प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥ रक्षा कर प्रह्लाद बचायो।   हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।   श्री नारायण अंग समाहीं॥ क्षीरसिन्धु में करत विलासा।   दयासिन्धु दीजै मन आसा॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।   महिमा अमित न जात बखानी॥ मातंगी अरु धूमावति माता।   भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी।   छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥ केहरि वाहन सोह भवानी।   लांगुर...

अथार्गलास्तोत्रम्

॥ अथार्गलास्तोत्रम् ॥ ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥ मार्कण्डेय उवाच ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥ मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥ महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥ रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥ शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥ वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥ अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥ नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥ स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रुपं देहि जयं ...

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्

॥ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥ शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥ गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्। पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥ ॥ अथ मन्त्रः ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं  चामुण्डायै विच्चे॥ ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥ ॥ इति मन्त्रः ॥ नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥2॥ ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥3॥ चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥4॥ धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं ...